11/01/2023
चाहतो के सिलसिले ओर बेखुदी ज़रा ज़रा ,
वो मुख़्तासीर सी ख्वाहिशे ओर आशिक़ी ज़रा
ज़रा..
ये दूरिया नज़दीकिया सब कहने सुनने की
बात हैं ,
हैं लफ़्ज़ों में भी फासले ओर बंदगी ज़रा
ज़रा..
किस अदा से मांग लूँ के मिल जाये मेरी खुशियाँ
मुझे ,
एक दुआ मुन्तज़िर - ए - लब और लफ्ज़ ज़रा ज़रा..
कांच के ये ख्वाब हैं पलके खुली तो कुछ
नहीं ,
बड़ी हसरते हैं जीने की और ज़िन्दगी ज़रा
ज़रा